CPI (Maoist) on Chhatisgarh Attack

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छत्तीसगढ कारबाहीबारे भाकपा (माओवादी)

This is the statement by Comrade Gudsa Usendi  the spokesperson of the Dandakaranya Special Zonal Committee, CPI(Maoist).  It highlights on the Chhatisgarh successful attack. This is in Hindi version and very soon we will post it in English  version too.   Here we express our  revolutionary solidarity to the Comrades of CPI(Maoist.

भारतीय प्रतिक्रियावादी सत्ताका तावेदारहरूका विरुध्द भारतको छत्तीसगढ़ राज्यको  दन्तेवाडा जिल्लामा भारतका माओवादी कमरेडहरूले गरेको प्रतिरोधी कारबाहीप्रति क्रान्तिकारी ऐक्यबद्धता जनाउँदै यस सफल  कारबाहीका बारेमा सो  विशेष राज्य समितिका प्रवक्ता कमरेड  गुड्सा उसेंडीले हिन्दीमा जारी गरेको प्रेस वक्तब्यलाई हामीले यहाँ प्रस्तुत गरेका छौँ  हामीले यो वक्तव्य भारतीय पत्रिका जनसत्ताबाट लिएका हौँ ।)

फासीवादी सलवा जुडूम के सरगना महेन्द्र कर्मा का सफाया : बस्तरियाआदिवासी जनता पर किए गए अमानवीय अत्याचारों, नृशंस हत्याकाण्डों और बेअंतआतंक की जायज प्रतिक्रिया!

बड़े कांग्रेसी नेताओंपर हमला : यूपीए सरकार द्वारा विभिन्न राज्य सरकारों के साथ मिलकर चलाए जारहे फासीवादी आपरेशन ग्रीनहंट का अनिवार्य प्रतिशोध!

25 मई 2013 को जन मुक्ति गुरिल्ला सेना की एक टुकड़ी ने कांग्रेस पार्टी के बड़ेनेताओं के 20 गाड़ियों के काफिले पर भारी हमला कर बस्तर की उत्पीड़ित जनता काजानी दुश्मन महेन्द्र कर्मा, छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमारपटेल समेत कुल कम से कम 27 कांग्रेसी नेताओं, कार्यकर्ताओं और पुलिस बलोंका सफाया करदिया। यह हमला उस समय किया गया था जब आगामी विधानसभाचुनावों के मद्देनजर कांग्रेस के दिग्गज नेता परिवर्तन यात्राचला रहेथे। इस कार्रवाई में भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री व वरिष्ठ कांग्रेस नेताविद्याचरण शुक्ल समेत कम से कम 30 लोग घायल हो गए। इस ऐतिहासिक हमले मेंउत्पीड़क, हत्यारा, बलात्कारी, लुटेरा और भ्रष्टाचारीके रूप में बदनाममहेन्द्र कर्मा के कुत्ते की मौत मारे जाने से समूचे बस्तर क्षेत्र मेंजश्न का माहौल बन गया। पूर्व में गृहमंत्री के रूप में काम करने वालानंदकुमार पटेल जनता पर दमनचक्र चलाने में आगे ही रहा था। उसकेसमय में हीबस्तर क्षेत्र में पहली बार अर्द्धसैनिक बलों (सीआरपीएफ) की तैनाती की गईथी। यह भी किसी से छिपी हुई बात नहीं कि लम्बे समय तक केन्द्रीय मंत्रीमंडलमें रहकर गृह विभाग समेत विभिन्न अहम मंत्रालयों को संभालने वाला वी.सी.शुक्ल भी जनता का दुश्मन है जिसने साम्राज्यवादियों, दलाल पूंजीपतियों औरजमींदारों के वफादार प्रतिनिधि के रूप में शोषणकारी नीतियों को बनाने औरलागू करने में सक्रिय भागीदारी ली। इस हमले का
लक्ष्य मुख्य रूप सेमहेन्द्र कर्मा तथा कुछ अन्य प्रतिक्रियावादी कांग्रेस नेताओं का खात्माकरना था। हालांकि इस भारी हमले में जब हमारे गुरिल्ला बलों और सशस्त्रपुलिस बलों के बीच लगभग दो घण्टों तक भीषण गोलीबारी हुई थी उसमें फंसकर कुछनिर्दोष लोगों और निचले स्तर के कांग्रेस कार्यकर्ताओं, जो हमारे दुश्मननहीं थे, कीजानें भी गईं। इनकी मृत्यु पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी खेद प्रकट करती है और उनकेशोकसंतप्त परिवारजनों के प्रति संवेदना प्रकट करती है। भारत की कम्युनिस्टपार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी इस हमले की पूर्णजिम्मेदारी लेती है। इस बहादुराना हमले का नेतृत्व करने वाले पीएलजीए केकमाण्डरों, हमले को सफल बनाने वाले वीरयोद्धाओं, इसे सफल बनाने मेंप्रत्यक्ष और परोक्ष सहयोग देने वाली जनता और समूची बस्तरिया क्रांतिकारीजनता का दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी इस मौके पर क्रांतिकारी अभिनंदन करतीहै। इस वीरतापूर्ण हमले से यह सच्चाई फिर एक बार साबित हो गई कि जनता परअमानवीय हिंसा, जुल्म और कत्लेआम करने वाले फासीवादियों को जनता कभी माफनहीं करेगी, चाहे वे कितने बड़े तीसमारखां भी क्यों न हो आखिर जनता के हाथोंसजा भुगतनी ही होगी। आदिवासी नेता कहलाने वाले महेन्द्र कर्मा का ताल्लुकदरअसल एक सामंती मांझी परिवार से रहा। इसका दादा मासा कर्मा था और बापबोड्डा मांझी था जो अपने समय में जनता के उत्पीड़क और विदेशी शासकों केगुर्गे रहे थे। इसके दादा के जमाने में नवब्याहाता लड़कियों को उसके घर परभेजने का रिवाज रहा। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसका खानदान कितनाकुख्यात था। इनका परिवार पूरा बड़े भूस्वामी होने के साथ-साथ आदिवासियों काअमानवीय शोषक व उत्पीड़क रहा। महेन्द्र कर्मा की राजनीतिक जिंदगी की शुरूआत 1975 में एआईएसएफ के सदस्य के रूप में हुई थी जब वह वकालत की पढ़ाई कर रहाथा। 1978 में पहली बार भाकपा की तरफ से विधायक बना था। बाद में 1981 में जबउसे भाकपा की टिकट नहीं मिली थी तो कांग्रेस में चला गया। बीच में जबकांग्रेस में फूट पड़ी थी तो वह माधवराव सिंधिया द्वारा बनाई गई पार्टी मेंशामिल होकर1996 में लोकसभा सदस्य बना था। बाद में फिर कांग्रेस में आगया। 1996 में बस्तर में छठवीं अनुसूची लागू करने की मांग से एक बड़ा आंदोलनचला था। हालांकि उस आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से भाकपा ने किया था, उससमय की हमारी पार्टी भाकपा (माले) (पीपुल्सवार) ने भी उसमें सक्रिय रूप सेभाग लेकर जनता को बड़े पैमाने पर गोलबंद किया था। लेकिन महेन्द्र कर्मा नेबाहर के इलाकों से आकर बस्तर में डेरा जमाकर करोड़पति बने स्वार्थी शहरीव्यापारियों का प्रतिनिधित्व करते हुए उस आंदोलन का पुरजोर विरोध किया था।इस तरह उसी समय उसके आदिवासी विरोधी व दलाल चरित्र को जनता ने साफ पहचानाथा। 1980 के दशक से ही बस्तर के बड़े व्यापारी व पूंजीपति वर्गों से उसकेसम्बन्ध मजबूत हुए थे। उसके बाद 1999 में मालिक मकबूजाके नाम से चर्चितएक घोटाले में कर्मा का नाम आया था। 1992-96 के बीच उसने लगभग 56 गांवोंमें फर्जीवाड़े आदिवासियों की जमीनों को सस्ते में खरीदकर, राजस्व व वनअधिकारियों से सांठगांठ कर उन जमीनों के अंदर मौजूद बेशकीमती पेड़ों कोकटवाया था। चोर व्यापारियों को लकड़ी बेचकर महेन्द्र कर्मा ने करोड़ों रुपएकमा लिए थे, इस बात का खुलासा लोकायुक्त की रिपोर्ट से हुआ था।

हालांकिइस पर सीबीआई जांच का आदेश भी हुआ था लेकिन सहज ही दोषियों को सजा नहींहुई। दलाल पूंजीपतियों और बस्तर के बड़े व्यापारियों के प्रतिनिधि के रूपमें कांग्रेस की ओर से चुनाव जीतने के बाद महेन्द्र कर्मा को अविभाजितमध्यप्रदेश शासन में जेल मंत्री और छत्तीसगढ़ के गठन के बाद उद्योग मंत्रीबनाया गया था। उस समय सरकार ने नगरनार में रोमेल्ट/एनएमडीसी द्वाराप्रस्तावित इस्पात संयंत्र के निर्माण केलिए जबरिया जमीन अधिग्रहण कियाथा। स्थानीय जनता ने अपनी जमीनें देने से इनकार करते हुए आंदोलन छेड़ दियाजबकि महेन्द्र कर्मा ने जन विरोधी रवैया अपनाया था। तीखे दमन का प्रयोग कर, जनता के साथ मारपीटकर, फर्जी केसों में जेलों में कैद कर आखिर में जमीनेंबलपूर्वक छीन ली गईं जिसमें कर्मा की मुख्य भूमिका रही। नगरनार में जमीनेंगंवाने वाली जनता को आज तक न तो मुआवजा मिला, न ही रोजगार मिला जैसे किसरकार ने वादा किया था। वो सब तितर-बितर हो गए।

क्रांतिकारी आंदोलनके प्रति महेन्द्र कर्मा शुरू से ही कट्टर दुश्मन रहा। ठेठ सामंती परिवारमें पैदा होना और बड़े व्यापारी/पूंजीपति वर्गों के प्रतिनिधि के रूप मेंबड़ाहोना ही इसका कारण है। क्रांतिकारी आंदोलन के खिलाफ 1990-91 में पहलाजन जागरण अभियान चलाया गया था। इसमें संशोधनवादी भाकपा ने सक्रिय रूप सेभाग लिया था। इस प्रति-क्रांतिकारी व जन विरोधी अभियान में कर्मा और उसकेकई रिश्तेदारों ने, जो भूस्वामी थे, सक्रिय भाग लिया था।1997-98 के दूसरे जन जागरण अभियान की महेन्द्र कर्मा ने खुद अगुवाई की थी। उसकेगृहग्राम फरसपाल और उसके आसपास के गांवों में शुरू हुआ यह अभियान भैरमगढ़ औरकुटरू इलाकों में भी पहुंच चुका था। सैकड़ों लोगों को पकड़कर, मारपीट करकेजेल भेज दिया गया था। लूटपाट और घरों में आग लगाने की घटनाएं हुईं। महिलाओंके साथ बलात्कार किया गया।हालांकि हमारी पार्टी और जन संगठनोंके नेतृत्व में जनता ने एकजुट होकर इस हमले का जोरदार मुकाबला किया। इससेकम समय के अंदर ही वह अभियान परास्त हो गया था।
उसके बाद क्रांतिकारीआंदोलन और ज्यादा संगठित हो गया। कई इलाकों में सामंतवाद-विरोधी संघर्ष तेजहो गए। इसके तहत हुए जन प्रतिरोध में महेन्द्र कर्मा के सगे भाई जमींदारपोदिया पटेल समेत कुछ नजदीकी रिश्तेदार मारे गए थे। गांव-गांव में सामंतीताकतों व दुष्ट मुखियाओं की सत्ता को उखाड़ फेंककर क्रांतिकारी जन राजसत्ताके अंगों के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई। गांवों में जन विरोधी व सामंतीतत्वों से जमीनें छीनकर जनता में बंटवारा करना, अतीत में जारी कबीले केमुखियाओं द्वारा नाजायज जुर्माने वसूले जाने की पद्धति को बंद कर जनता काजनवादी शासन को शुरू करना कट्टर सामंती अहंकार से सराबोर महेन्द्र कर्मा कोबिल्कुल रास नहीं आया। महिलाओं की जबरिया शादियां करवाने पर रोक, बहुपत्नीत्व आदि रिवाजों को हतोत्साहित करना आदि  प्रगतिशील बदलाव भीसामंती ताकतों के गले नहीं उतरे। उसी समय बस्तर क्षेत्र में भारीपरियोजनाएं शुरू कर यहां की जनता को बड़े पैमाने पर विस्थापित कर यहां कीप्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन करने की मंशा से उतरे टाटा, एस्सार जैसेकार्पोरेट घरानों के लिए भी यहां का विकासशील क्रांतिकारी आंदोलन आंखों कीकिरकिरी बना था। इसलिए उन्होंने सहज ही महेन्द्र कर्मा जैसीप्रतिक्रांतिकारी ताकतों से सांठगांठ कर ली। उन्हें करोड़ों रुपए की दलालीखिला दी ताकि अपनी मनमानी लूटखसोट के लिए माकूल माहौल बनाया जा सके।दूसरीओर, देश भर में सच्चे क्रांतिकारी संगठनों के बीच हुए विलय के बाद एकसंगठित पार्टी के रूप में भाकपा (माओवादी) के आविर्भाव की पृष्ठभूमि मेंउसे कुचल देने के लिए शोषक शासक वर्गों ने अपने साम्राज्यवादी आकाओं केइशारों पर\ प्रतिक्रांतिकारी हमला तेज कर दिया।अपनी एलआईसी नीतिके तहत महेन्द्र कर्मा जैसी कट्टर प्रतिक्रांतिकारी ताकतों को आगे करते हुएएक फासीवादी हमले की साजिश रचाई। इस तरह, कांग्रेस और भाजपा की सांठगांठसे एक बर्बरतापूर्ण हमला शुरू कर दिया गया जिसे सलवा जुडुमनाम दिया गया।रमन सिंह और महेन्द्र कर्मा के बीच कितना बढ़िया तालमेल रहा इसे समझने केलिए एक तथ्य काफी है कि मीडिया में कर्मा को रमन मंत्रीमण्डल का सोलहवांमंत्रीकहा जाने लगा था। सोयम मूका, रामभुवन कुशवाहा, अजयसिंह, विक्रममण्डावी, गन्नू पटेल, मधुकरराव, गोटा चिन्ना, आदि महेन्द्र कर्माके करीबी और रिश्तेदार सलवा जुडूम के अहम नेता बनकर उभरे थे। साथ ही, उसकेबेटे और अन्य करीबी रिश्तेदार सरपंच पद से लेकर जिला पंचायत तक के सभीस्थानीय पदों पर कब्जा करके गुण्डागर्दी वाली राजनीति करते हुए, सरकारीपैसों का बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार करते हुए कार्पोरेट कम्पनियों और बड़ेव्यापारियों का हित पोषण कर रहे हैं। और सलवा जुडूम ने बस्तर के जन जीवनमें जो तबाही मचाई और जो क्रूरता बरती उसकी तुलना में इतिहास में बहुत कमउदाहरण मिलेंगे। कुल एक हजार से ज्यादा लोगों की हत्या कर, 640 गांवों कोकब्रगाह में तब्दील कर, हजारों घरों को लूट कर, मुर्गों, बकरों, सुअरों आदिको खाकर और लूटकर, दो लाख से ज्यादा लोगों को विस्थापित कर, 50 हजार सेज्यादा लोगों को बलपूर्वक राहतशिविरों में घसीटकर सलवा जुडूम जनता केलिए अभिशाप बना था। सैकड़ों महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। कईमहिलाओं की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई। कई जगहों पर सामूहिकहत्याकाण्ड किए गए। हत्या के 500, बलात्कार के 99 और घर जलाने के 103 मामलेसर्वोच्च अदालत में दर्ज हैं तो यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन अपराधोंकी वास्तविक संख्या कितनी ज्यादा होगी। सलवा जुडूम के गुण्डा गिरोहों, खासकर पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों, नगाऔर मिज़ो बटालियनों ने जनता पर जोकहर बरपाया और जो जुल्म किए उसकी कोई सीमा नहीं रही।  ऐसी कई घटनाएं हुईंजिसमें लोगों को निर्ममता के साथ टुकड़ों-टुकड़ों में काटकर नदियों में फेंकदिया गया। चेरली, कोत्रापाल, मनकेली, कर्रेमरका, मोसला, मुण्डेर, पदेड़ा, परालनार, पूंबाड़, गगनपल्ली… ऐसे कई गांवों में लोगों की सामूहिक रूप सेहत्याएं की गईं। सैकड़ों आदिवासी युवकों को एसपीओ बनाकर उन्हें कट्टरअपराधियों में तब्दील कर दिया गया। महेन्द्र कर्मा ने खुद कई गांवों मेंसभाओं और पदयात्राओं के नाम से हमलों की अगुवाई की। कई महिलाओं पर अपने पशुबलों को उकसाकर बलात्कार करवाने की दरिंदगी भरे उसके इतिहास को कोई भुलानहीं सकता। जो गांव समर्पण नहीं करता उसे जलाकर राख कर देने, जो पकड़ मेंआता है उसे अमानवीय यातनाएं देने और हत्या करने की कई घटनाओं में कर्मा नेखुद भाग लिया था। इस तरह महेन्द्र कर्मा बस्तर की जनता के दिलोदिमाग में एकअमानुष हत्यारा, बलात्कारी, डकैत और बड़े पूंजीपतियों के वफादार दलाल केरूप में अंकित हुआ था। पूरे बस्तर में जनता कई सालों से हमारी पार्टी औरपीएलजीए से मांग करती रही कि उसे दण्डित किया जाए। कई लोग उसका सफाया करनेमें सक्रिय सहयोग देने के लिए स्वैच्छिक रूप से आगे आए थे। कुछ कोशिशें हुईभी थीं लेकिन छोटी-छोटी गलतियों और अन्य कारणों से वह बचता रहा। आखिरकार, कल, जनता के सक्रिय सहयोग से किए गए इस बहादुराना हमले में हमारी पीएलजीएने महेन्द्र कर्मा का सफाया कर बस्तर कीजनता को बेहद राहत पहुंचाई। इसकार्रवाई के जरिए हमने उन एक हजार से ज्यादा आदिवासियों की ओर से बदला लेलिया जिनकी सलवा जुडूम के गुण्डों और सरकारी सशस्त्र बलों के हाथों हत्याहुई थी। हम उन सैकड़ों मां-बहनों की ओर से बदला ले लिया जो बेहद अमावीयहिंसा, अपमान और अत्याचारों का शिकार हुई थीं। हम उन हजारों बस्तरवासियोंकी ओर से बदला ले लिया जो अपने घरों, मवेशियों, मुर्गों-बकरों, गंजी-बर्तनों, कपड़ों, अनाज, फसलों… सब कुछ गंवाकर ठहरने की छांव तक छिनजाने से घोर बदहाली झेलने पर मजबूर कर दिए गए थे। घरबार गंवाकर, टिककर रहनेतक की जगह के अभाव में, इस अनभिज्ञता से कि अपने प्रियजनों में कौन जिंदाबचा है और कौन खत्म हो गया, बदहवास तितर-बितर हुए तमाम लोगों के गुस्से औरआवेश को एक न्यायोचित और आवश्यक अभिव्यक्ति देते हुए हमने महेन्द्र कर्माका सफाया कर दिया।

इस हमले के तुरंत बाद प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री रमनसिंह…सभीने इसे लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला बताया। भाजपा अध्यक्षराजनाथसिंह इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए यह आह्वान किया कि दलगतराजनीति से ऊपर उठकर सबको मिलजुलकर नक्सलवाद और आतंकवाद का मुकाबला करनाचाहिए। हम पूछते हैं कि क्या शोषक वर्गों के इन पालतू कुत्तों को लोकतंत्रका नाम तक लेने की नैतिक योग्यता है। अभी-अभी, 17 मई को बीजापुर जिले केएड़समेट्टागांव में तीन मासूमों समेत आठ लोगों की जब पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों नेहत्या की तब क्या इनको लोकतंत्रकी याद नहीं आई? जिस काण्ड को खुदकांग्रेस के स्थानीय नेताओं को भी मजबूरन नरसंहारबताना पड़ा था, उस पर इननेताओं के मुंह पर ताले क्यों लग गए थे? 1 मई को नारायणपुर जिले केमड़ोहनार गांव के फूलसिंह और जयसिंह नामक दो आदिवासी भाइयों को पुलिस थानाबुलाकर हरी वद्रियां पहनाकर गोली मारकर जब मुठभेड़की घोषणा की गई थी तबक्या इनका लोकतंत्रखुश था? 20-23 जनवरी के बीच बीजापुर जिले के पिड़ियाऔर दोड्डि तुमनार गांवों पर हमले कर 20 घरों में आग लगाकर, जनता द्वारासंचालित स्कूल तक को जला देने पर क्या इनका लोकतंत्रफलता-फूलता रहा?
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फरवरी के बीच अबूझमाड़ कहलाने वाले बेहद पिछड़े आदिवासी इलाके के गरीबमाड़िया लोगों का गांव गट्टाकाल पर जब सरकारी सशस्त्र बलों ने हमला कर, घरोंको लूटकर, जनता के साथ मारपीट कर, गांव में क्रांतिकारी जनताना सरकारद्वारा संचालित स्कूल को जलाकर राख कर दिया था तब इनका लोकतंत्रक्या कररहा था? आज से ठीक 11 महीने पहले 28 जून 2012 की रात में सारकिनगुड़ा में 17 आदिवासियों के खून की होली खेलना और 13 युवतियों के साथ बलात्कार करनाक्या लोकतंत्रिक मूल्योंका हिस्सा था? क्या यह लोकतंत्र महेन्द्र कर्माजैसे हत्यारों और नंदकुमार पटेल जैसे शोषक शासक वर्गों के गुर्गों पर हीलागू होता है? बस्तर के गरीब आदिवासियों, बूढ़ों, बच्चों और महिलाओं पर लागूनहीं होता?

उनका चाहे कितनी बड़ी संख्या में, चाहे कितनी हीबार कत्लेआम करना क्या लोकतंत्रका हिस्सा ही था? क्या इन सवालों काजवाब उन लोगों के पास है जो इस हमले पर हाय तौबा मचा रहे हैं?
2005
से 2007 तक चला सलवा जुडूम जनता के प्रतिरोध से पराजित हो गया। उसके बाद 2009 में कांग्रेस-नीत यूपीए-2 सरकार ने देशव्यापी हमले के रूप में आपरेशनग्रीनहंट की शुरूआत की। इसके लिए अमेरिकी साम्राज्यवादी न सिर्फ मार्गदर्शनऔर मदद व सहयोग दे रहे हैं, बल्कि अपने स्पेशल फोर्स को तैनात करकेकाउण्टर इंसर्जेन्सी आपरेशन्स का संचालन करवा रहे हैं। खासकर माओवादीनेतृत्व की हत्या करने पर उनका जोर है। आपरेशन ग्रीनहंट के नाम से जनता परजारी युद्धके अंतर्गत कांग्रेस की केन्द्र सरकार ने अभी तक 50 हजार सेज्यादा अर्द्धसैनिक बल छत्तीसगढ़ में भेज दिए। इसके फलस्वरूप नरसंहारों औरतबाही में कई गुना बढ़ोत्तरी हुई। अब तक 400 से ज्यादा आदिवासियों कोकेन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा भेजे गए सशस्त्र पुलिस व अर्द्धसैनिक बलोंने मार डाला। 2011 के मध्य से यहां पर प्रशिक्षण के नाम से सैन्य बलों कीतैनाती शुरू कर दी गई। प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह के अलावा पहले चिदम्बरम औरशिंदे दोनों ही रमनसिंह द्वारा चलाए जा रहे हमले से खुश होकर लगातार वादेपर वादे कर रहे हैं कि मुंहमांगी सहायता दी जाएगी। रमनसिंह भी केन्द्र सेमिल रही मदद पर तारीफ के पुल बांधने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। छत्तीसगढ़में क्रांतिकारी आंदोलन के दमन की नीतियों के मामले में सत्तारूढ़ भाजपा औरविपक्षी कांग्रेस के बीच कोई मतभेद नहीं है। सिर्फ जनता के दबाव में औरसाथ ही, चुनावी फायदों के मद्देनजर कांग्रेस के कुछ स्थानीय नेताओं नेसारकिनगुड़ा, एड़समेट्टा जैसे नरसंहारों का खण्डन करने का दिखावा किया। जबकिउसमें ईमानदारी बिल्कुल अभाव है। राज्य में रमनसिंह द्वारा लागू जन विरोधीऔर कार्पोरेट अनुकूल नीतियों के प्रति और दमनात्मक नीतियों के प्रतिकांग्रेस को कोई विरोध नहीं है। वह विरोध का महज दिखावा कर रही है जोअवसरवाद के अलावा कुछ नहीं है। दमन की नीतियों को लागू करने में इन दोनोंपार्टियों की समान भागीदारी है। इतना ही नहीं, आंध्रप्रदेश से ग्रेहाउण्ड्सबलों का बार-बार छत्तीसगढ की सीमा के अंदर घुसना और पहले कंचाल (2008) औरअभी-अभी पुव्वर्ति (16 मई 2013) में भारी हत्याकाण्डों को अंजाम देना भीकांग्रेस द्वारा लागू दमनात्मक नीतियों का ही हिस्सा है। इसीलिए हमनेकांग्रेस के बड़े नेताओं को निशाने पर लिया।

आज दण्डकारण्यके क्रांतिकारी आंदोलन के खिलाफ खड़े हुए छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री रमनसिंह, गृहमंत्री ननकीराम कंवर, मंत्री रामविचार नेताम, केदार कश्यप, विक्रम  उसेण्डी, राज्यपाल शेखर दत्त, महाराष्ट्र गृहमंत्री आरआर. पाटिल आदि; डीजीपी रामनिवास, एडीजी मुकेश गुप्ता जैसे पुलिस के आला अधिकारी इस गफलतमें हैं कि सेक्यूरिटी और बुलेटप्रूफ गाड़ियां उसे हमेशा बचाएंगी।दुनिया के इतिहास में हिटलर और मुस्सोलिनी भी इसी घमण्ड में थे कि उन्हेंकोई नहीं हरा सकता। हमारे देश के समकालीन इतिहास में इंदिरा गांधी, राजीवगांधी जैसे फासीवादी भी इसी गलतफहमी के शिकार थे। लेकिन जनता अपराजेय है।जनता ही इतिहास का निर्माता है। मुठ्ठी भर लुटेरे और उनके चंद पालतू कुत्तेआखिरकार इतिहास के कूड़ादान में ही फेंक दिए जाएंगे। भारत की कम्युनिस्टपार्टी (माओवादी) की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी मजदूरों, किसानों, छात्र-बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों, मीडियाकर्मियों, तमाम जनवादियों सेअपील करती है कि वे सरकारों सेमांग करें कि आपरेशन ग्रीनहंट को तत्कालबंद कर दिया जाए; दण्डकारण्य में तैनात सभी किस्म के अर्द्धसैनिक बलों कोवापस लिया जाए; प्रशिक्षण के नाम से भारत की सेना को बस्तर में तैनात करनेकी साजिशों को बंद किया जाए; वायुसेना के हस्तक्षेप को रोक दिया जाए; जेलोंमें कैद क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं और आम आदिवासियों को फौरन व बिना शर्तरिहा किया जाए; यूएपीए, छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा कानून जैसे क्रूरकानूनों को रद्द किया जाए; तथा प्राकृतिक संपदाओं के दोहन की मंशा सेविभिन्न कार्पोरेट कम्पनियों के साथ किए गए एमओयू को रद्द किया जाए।

(गुड्सा उसेण्डी)

प्रवक्ता,
दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

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2 Responses to “CPI (Maoist) on Chhatisgarh Attack”

  1. Long Live Revolution- If I became martyr some one must lift my gun.

  2. sheela says:

    Long live revolution….!!

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